कुछ भी तो नही बदलता,
सुबह से शाम तक,ऑफिस को जाने से ऑफिस से आने तक,
चाय की प्याली से डिनर की थाली तक ,
कुछ भी तो नही बदलता, सुबह से शाम...
२.
वही अस्त - व्यस्त सा कमरा , बिखरा अख़बार
समेटे उलझी घटनाये , और मृत संवेदनाये ,
वही कमरे की चारदीवारी,
सुबह जैसी , अभी भी वैसी,
चुपचाप मौन, अपलक मुझे निहारती,
३।
वो रास्ता, जो रोज ख़त्म होकर भी,
रोज फिर शुरु हो जाता है,
और गली का का वो कुत्ता,
जो थोड़ा गुर्राता है , और फिर थककर सो जाता है,
कुछ भी तो नही बदलता, सुबह से शाम...
४।
कुछ भी तो नही बदलता,
आदमी भी वही, और उसकी परिभाषा भी,
हाँ ये सच है, की अभिलाषाएं थोडी घट -बढ़ जाती हैं,
कुछ रस्ते में ही बिखर जाती हैं,
और कुछ पुरी होकर, ख़त्म हो जाती हैं,
५.
जिंदगी का एक दिन , हाथ से फिसल जाता है,
सवरने की तलाश में, टूटकर बिखर जाता है,
कई आशाएं, जिंदा ही दफन हो जाती है,
कई सपने , दिवास्पन रह जाते हैं,
कुछ यादें मन का दरवाजा खटखटाकर ,
खली हाथ लौट जाती हैं,
और कई संवेदनाये , जिंदगी की व्यस्तता देख ,
अलविदा कह जाती है,
६।
कई ख्वाब बदल जाते हैं,
कई लम्हे गुजर बदल जाते हैं,
कई यादें सिमट जाती हैं,
कई यादें बिखर जाती हैं,
एक वक्त बदल जाता है,
उम्र बदल जाती है,
कुछ साथी बिछर जाते हैं,
कुछ रिश्ते उलझ जाते हैं,
सूरज भी बदल जाता है,
तारीख बदल जाती है,
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क्या क्या ना बदलता है,
सुबह से शाम तक, (repeat above two lines two times)
नही बदलता तो बस मेरा ये ख्याल,
जो अब भी यही कहता है,
कुछ भी तो नही बदलता, सुबह से शाम तक