Sunday, May 9, 2010

अंधकार

विस्तारित ये काली रात,
शोक संताप का अंधकार,
प्रभात पर लगा प्रश्नचिन्ह,
अनुत्तरित ये सृष्टि सारी,
क्यों सोई है निश्चिन्त,

पदचाप कर्ण पर उभरे हैं,
कुछ आने के, कुछ जाने के,
संशय मन में छिपे हुए हैं,
जीवन को भरमाने के,

चन्द्र किरणे हैं, ओझल क्यों,
पवन चली है, बोझल क्यों,
क्यों नदियाँ सारी है, चुपचाप,
सागर क्यों गंभीर हैं आज,

अंधकार में डटे हुए,
उलूक के फड-फड पाँखो में,
भय व्याप्त सारा है जग में,
और ताने हुए उन साखों में,
कुछ छनों पूर्व ही फैले जो,
आकाश की सुन्दर बांहों में,

मैं भी हूँ अंधकार से व्याकुल,
अधना सा जीव सृष्टि का,
अंध बिंदु कर समा गया,
मुझे अंधकार जो सिन्धु सा...

Monday, May 3, 2010

समय के पंख

समय पंख लगाकर उड़ गया,
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,

अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..