Thursday, August 13, 2009

अहसास

कभी कड़ी, दोपहरी में,
बैठे हों फुरसत से,घर के भीतर,
पंखे के नीचे, थोड़ा सुस्ताते
या कूलर के आगे, थोड़ा अलसाते,
और एक छोटी सी चिडिया,
पी जाए पानी,
जो फर्श पर गिरा था,
अनजाने किसी से,
और उड़ जाए फुर्र से, थोड़ा डरते-डरते,
तो पूछो ये ख़ुद से , ये अहसास क्या है......

बारिश में छतरी की नीचे,
खड़े हों चुपचाप,
बूंदों से बचते-बचते,
और दिख जाए कोई बच्चा भीगता चिल्लाता
बारिश के गीत गाते,
और गुदगुदा जाए मन को,
तो पूछो ये ख़ुद से,ये अहसास क्या है.........