(१)
काले स्याह सा अँधेरा, कुछ जगमगाते जुगनू,
कुछ जागते परिंदे, कुछ खड़कते पत्ते
बिना "आहट" किये मुमकिन नहीं रौशनी का आना...
(२)
शरमा जाती है, जमीन कुरेदती वो पावों के अंगूठे से,
घबरा जाती है, वो छुपती हुई परदे के पीछे से,
जिन्दगी है, अभी तक अपनी ना हुई...
(3 )
पतझड़ में दरख्त के पत्ते बिखर गए,
कल तक साथ थे जो साखों के संग,
वक़्त के साथ रिश्ते छुट जाते हैं