ये कैसा जीवन? छोभ नया, कभी शोक नया कभी रोग नया,
नित जीने के आयाम बढे, कभी लाभ नया कभी लोभ नया,
हृदय के हर स्पंदन में, बदली है मेरी परिभाषा
कभी खुद ही मैं गुमनाम हुआ, कही पाप नया कहीं दोष नया,
कभी मर्यादा, कभी लोक लाज, कभी ग्रंथो के निर्देश-जाल,
मैं निर्णायक कभी हुआ नहीं, कभी दिशा नई , कभी दशा नया,
कभी ये समाज , कभी जड़ रिवाज , कभी अपनों की है मजबूरी,
ये जीवन क्या खुद मैं जीता? कभी स्वामी नया, कभी नाट्य नया,