कुछ इस कदर हुई, मेरी दुआ कबूल, असर होने की उम्र उनकी, मेरी उम्र से लंबी थी।
Monday, May 3, 2010
समय के पंख
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,
अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..
Friday, April 2, 2010
तीन पत्थर
पत्थरों(१) को पूजकर,
पत्थर(२) बरसाते परस्पर, ये पत्थर(३),
इन पत्थरों की चोट,
बहुत गहरी होती है,
सदियों तक अमिट रहने वाली,
कलंकित करने वाली...
हाँ, कलंकित कर जाती है ये,
मेरे शहर को, मेरे देश को,
और भ्रम पैदा कर जाती है,
कठोर पत्थर की चोट,
उस मासूम के कोमल मन पर,
जो पढ़ रहा है किताब की वो लकीर,
जहाँ लिखा है,
"आपस में है भाई भाई"
कौन?
कौन है आपस में भाई-भाई?
ये पत्थर जो चोट पहुंचाते हैं एक दूसरे को?
जो बस्तियां जला देते हैं, बात बात पर
जो लूटते हैं घरों को, जात पात पर
जो धर्म की घृणा के नाम पर,करते हैं बलात्कार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार....
ये पत्थर पहले इंसान ही बन जाएँ
फिर बने-या-ना-बने भाई-भाई
क्या फर्क पड़ता है, दुश्मन ना बने बस,
हाँ, बस ये दुश्मन ना बने,
फिर शायद, वो पत्थर भी शर्मिंदा ना होगा,
जो शर्मिंदा है..अपने द्वारा किसी के कुचले जाने से,
जो शर्मिंदा है..किसी के मौत का कारण बन जाने से,
जिसे अपने होने पर, पहले से ही पछतावा था,
और अब अपनी दरिंदगी पर,करना चाहता है वह आत्महत्या
ये वही पत्थर है.. जिससे कुचलकर की गई थी किसी की हत्या..
और पहले ये हुआ करता था,उस लिखावट का एक हिस्सा,
जिस पर लिखा था "यहाँ पेशाब करना मना है"
Wednesday, January 20, 2010
सवालिया भगवान
हर शख्स खुद से अनजान क्यों है
इंसानियत कहाँ गई इतनी दूर चलकर,
इस सवाल पर चुपचाप खड़ा इन्सान क्यों है?
वक़्त मुंह फेरे खड़ा है, हवा भी उलटी दिशा में,
धरती फट पड़ी और रो रहा आसमान क्यों हैं?
हर तरफ खून के कतरे और गोलियां दनादन,
मेरे वतन की गलियां यूँ सुनसान क्यों हैं?
न सवाल ही रहा कोई, न जवाब बाकि रहा,
सवालिया बना अब भी देख रहा भगवान क्यों है?
Friday, October 2, 2009
मेरी त्रिवेणी-1
काले स्याह सा अँधेरा, कुछ जगमगाते जुगनू,
कुछ जागते परिंदे, कुछ खड़कते पत्ते
बिना "आहट" किये मुमकिन नहीं रौशनी का आना...
(२)
शरमा जाती है, जमीन कुरेदती वो पावों के अंगूठे से,
घबरा जाती है, वो छुपती हुई परदे के पीछे से,
जिन्दगी है, अभी तक अपनी ना हुई...
(3 )
पतझड़ में दरख्त के पत्ते बिखर गए,
कल तक साथ थे जो साखों के संग,
वक़्त के साथ रिश्ते छुट जाते हैं
Saturday, September 26, 2009
एक पुरानी गजल
मुझ पर क्या असर करेंगी, ये बला की हवायें
Thursday, August 13, 2009
अहसास
बैठे हों फुरसत से,घर के भीतर,
पंखे के नीचे, थोड़ा सुस्ताते
या कूलर के आगे, थोड़ा अलसाते,
और एक छोटी सी चिडिया,
पी जाए पानी,
जो फर्श पर गिरा था,
अनजाने किसी से,
और उड़ जाए फुर्र से, थोड़ा डरते-डरते,
तो पूछो ये ख़ुद से , ये अहसास क्या है......
बारिश में छतरी की नीचे,
खड़े हों चुपचाप,
बूंदों से बचते-बचते,
और दिख जाए कोई बच्चा भीगता चिल्लाता
बारिश के गीत गाते,
और गुदगुदा जाए मन को,
तो पूछो ये ख़ुद से,ये अहसास क्या है.........
Tuesday, April 28, 2009
दायरा
(१)
एक बड़ा सा शहर, और मेरे ऑफिस की बहुमंजिली ईमारत,
तीसरे माले पर दीवार से सटा , मेरा डेस्क ,
डेस्कटॉप, पेन होल्डर, प्लानर और न जाने क्या क्या ,
मेरा अपना दायरा,
हाँ मेरा अपना दायरा, मेरे ऑफिस की दुनिया,
(२)
मैं ब्यस्त था अपने कामों में,
अचानक, बाहर बारिश होने लगी थी,
बुँदे दीवार पर ग्लास को भिगोने लगी थी,
बूंदों का फिसलना , ग्लास पर अठखेलियाँ करना ,
और फिर नीचे गिर जाना ,
जैसे जिंदगी के तस्वीर में कई रंग उभर आना,
रंग वो बचपन का ,
जब गलियों के बहते पानी में नाव चलते थे,
छत के गिरते पानी से ख़ुद को भिगाते थे,
ठण्ड से ठिठुरना, और गीली लकडियों की आग,
और माँ के डाट डपट से , लुका छिपी और भागम भाग,
तभी फ़ोन की घंटी ने मुझे ख्यालों से जगाया,
कोड के डिलिवरी है ये याद दिलाया
(३)
तब तक ग्लास से वो बूंदें फिसल चुकी थीं,
मेरी यादें सहम के कही सिमट चुकी थीं,
मेरा बचपन , वो गाँव की गलियां ,
बच्चों की आवाजें, माँ की डाट डपट ,
भीगता आँगन, छत का गिरता पानी,
सब कुछ सिमट गए थे,
सहम से गए थे, मानो छुप गए हो कहीं
मेरे डेस्क के इर्द-गिर्द,
मेरे ही दायरे में मेरा बचपन कहीं खो सा गया था,
या शायद, dustbin में पड़े कागज की तरह बिखर गया था
(४)
थोड़ा अँधेरा, काम ख़त्म आज का, मैं घर के रस्ते में था,
फिर वही लोग, दौड़ते भागते, घर को लौटते
बहुत से उदास दायरे,
थके हुए चेहरे, कल की तस्वीरें,
इन सबको चीरता मैं भी, पर इनमे शामिल था,
अचानक तेज बरसात होने लगी थी,
मन की आशाओं की भिगोने लगी थी,
इस बार मैं भीड़ से अलग थलग,
भीगता जा रहा था, जान बुझकर ,
देखता रहा, बारिश की बूंदों को उँगलियों के पोरों पर फिसलते,
कभी अपने चेहरे से लिपटते,
मैं इस कदर ख़ुद को भीगाने लगा था,
खोई छोटी छोटी खुशियाँ, फिर पाने लगा था,
कितना बड़ा था मेरा दायरा इस बार,
और कितनी बड़ी थी मेरी दुनिया......कितनी बड़ी है मेरी दुनिया।