Saturday, January 17, 2009

युद्ध - स्वयं से




एक युद्ध छिड़ा है, अंतर्मन में,
हाँ ये युद्ध है , स्वयं से,

ये युद्ध है,
अपने आज से, बीते उस कल से,
सांसो के हर करवट पर, गुजरते पल-पल से,
युद्ध अपनी सीमाओं से, रीती से परम्पराओं से,
दुर्भेद्य मन की दीवारों से,
कहीं पाप से तो कहीं अत्याचारों से,

ये युद्ध है,
कुछ परायों के संग अपनों से,
जो न बन पाई हकीकत, उन अधूरे सपनो से,
हाँ ये युद्ध है, एक अनजाने भ्रम से,
जो ख़त्म हो चुका, उस टूटे जीवन के क्रम से,
ये युद्ध है, मन को हराने वाली यादों से,
जो बिगड़ चुकी कब से, उन अनमनी बातो से,

पर.............
सोचकर इस युद्ध के परिणाम को,
अक्सर मैं, शंकित हो जाता हूँ,
जीतता हूँ, तो भी स्वयं को अकेला ही पाता हूँ,
कौन रहेगा मेरे साथ,
जो साथ हैं, वो समय की बाढ़ में बह जायेंगे,
मेरे आधुनिक विचार, भी तो,
वृद्ध और क्षीण कहलायेंगे,
स्वप्नों के रंग भी तो,
फीके पड़ जायेंगे,
पापी और अत्याचारी, भी गल सड़ जायेंगे,
जब इस युद्ध में ही मेरी हार होगी,तो मैं युद्ध की भाषा क्यों गढ़ रहा हूँ,
एक अनजाने युद्ध में, योद्धाओं की तरह क्यों लड़ रहा हूँ॥

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