माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,
तेरे गोद में वो अब नहीं आएगा,
ना ही तेरे आँचल में वो छुप जायेगा.
ये आँगन तरसता रहेगा..उम्र भर..
मगर उसके आहट को ना पायेगा.
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,
वो अब नहीं बोलेगा,
माँ, आज सर में दर्द है, बालों में ऊँगली फिराना,
आज आलू खाने का मन नहीं कर रहा,
करेले की सब्जी बनाना..
अब तुम उसे डांट नहीं पाओगी,
ज्यादा मिर्च खाने पर..
ना ही दुलार पाओगी..
उसके थककर घर लौट आने पर..
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का, वो बहुत दूर जा चुका,
चल माँ, अब कुछ खा ले,
दिल को बहला ले,
इन पथराई आखों को थोडा आराम दे..
माँ, याद है होली में,,
वो रंगों के बीच कैसे गुम हो जाता था..
और वो रंगों से भीगे, बताशे खाने को फिर निकल आता था..
कहता था..माँ भूख लगी है..
और मुंह में गुझिया दबाये फिर चला जाता था..
माँ अब बताशे कौन खायेगा..
और वो गुझीये खाने थोड़ी ना लौट कर आएगा..
माँ, और वो दिवाली में तुम्हारा रंगोली बनाना,
हम दोनों, अपनी पसंद के रंग खानों में भर देते थे..
उनके बीच दीप रख देते थे..
माँ, हम इस बार दीप नहीं जलाएंगे..
वो ही नहीं है तो रंगोली भी क्यों बनायेंगे..
आँगन को रहने देंगे सूना सूना,
हो सकता है वो आकर पूछे,
कि रंगोली क्यों नहीं बनाई?
दीपों कि माला आँगन में क्यों नहीं सजाई?
माँ, मगर वो परियों के देश से कैसे निकल पायेगा?
सिर्फ तेरी रंगोली देखने..इतनी दूर से वो नहीं आएगा..
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,
कुछ इस कदर हुई, मेरी दुआ कबूल, असर होने की उम्र उनकी, मेरी उम्र से लंबी थी।
Thursday, October 21, 2010
Sunday, May 9, 2010
अंधकार
विस्तारित ये काली रात,
शोक संताप का अंधकार,
प्रभात पर लगा प्रश्नचिन्ह,
अनुत्तरित ये सृष्टि सारी,
क्यों सोई है निश्चिन्त,
पदचाप कर्ण पर उभरे हैं,
कुछ आने के, कुछ जाने के,
संशय मन में छिपे हुए हैं,
जीवन को भरमाने के,
चन्द्र किरणे हैं, ओझल क्यों,
पवन चली है, बोझल क्यों,
क्यों नदियाँ सारी है, चुपचाप,
सागर क्यों गंभीर हैं आज,
अंधकार में डटे हुए,
उलूक के फड-फड पाँखो में,
भय व्याप्त सारा है जग में,
और ताने हुए उन साखों में,
कुछ छनों पूर्व ही फैले जो,
आकाश की सुन्दर बांहों में,
मैं भी हूँ अंधकार से व्याकुल,
अधना सा जीव सृष्टि का,
अंध बिंदु कर समा गया,
मुझे अंधकार जो सिन्धु सा...
शोक संताप का अंधकार,
प्रभात पर लगा प्रश्नचिन्ह,
अनुत्तरित ये सृष्टि सारी,
क्यों सोई है निश्चिन्त,
पदचाप कर्ण पर उभरे हैं,
कुछ आने के, कुछ जाने के,
संशय मन में छिपे हुए हैं,
जीवन को भरमाने के,
चन्द्र किरणे हैं, ओझल क्यों,
पवन चली है, बोझल क्यों,
क्यों नदियाँ सारी है, चुपचाप,
सागर क्यों गंभीर हैं आज,
अंधकार में डटे हुए,
उलूक के फड-फड पाँखो में,
भय व्याप्त सारा है जग में,
और ताने हुए उन साखों में,
कुछ छनों पूर्व ही फैले जो,
आकाश की सुन्दर बांहों में,
मैं भी हूँ अंधकार से व्याकुल,
अधना सा जीव सृष्टि का,
अंध बिंदु कर समा गया,
मुझे अंधकार जो सिन्धु सा...
Monday, May 3, 2010
समय के पंख
समय पंख लगाकर उड़ गया,
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,
अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,
अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..
Friday, April 2, 2010
तीन पत्थर
( हैदराबाद में अप्रैल.१० के कौमी दंगो पर )
पत्थरों(१) को पूजकर,
पत्थर(२) बरसाते परस्पर, ये पत्थर(३),
इन पत्थरों की चोट,
बहुत गहरी होती है,
सदियों तक अमिट रहने वाली,
कलंकित करने वाली...
हाँ, कलंकित कर जाती है ये,
मेरे शहर को, मेरे देश को,
और भ्रम पैदा कर जाती है,
कठोर पत्थर की चोट,
उस मासूम के कोमल मन पर,
जो पढ़ रहा है किताब की वो लकीर,
जहाँ लिखा है,
"आपस में है भाई भाई"
कौन?
कौन है आपस में भाई-भाई?
ये पत्थर जो चोट पहुंचाते हैं एक दूसरे को?
जो बस्तियां जला देते हैं, बात बात पर
जो लूटते हैं घरों को, जात पात पर
जो धर्म की घृणा के नाम पर,करते हैं बलात्कार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार....
ये पत्थर पहले इंसान ही बन जाएँ
फिर बने-या-ना-बने भाई-भाई
क्या फर्क पड़ता है, दुश्मन ना बने बस,
हाँ, बस ये दुश्मन ना बने,
फिर शायद, वो पत्थर भी शर्मिंदा ना होगा,
जो शर्मिंदा है..अपने द्वारा किसी के कुचले जाने से,
जो शर्मिंदा है..किसी के मौत का कारण बन जाने से,
जिसे अपने होने पर, पहले से ही पछतावा था,
और अब अपनी दरिंदगी पर,करना चाहता है वह आत्महत्या
ये वही पत्थर है.. जिससे कुचलकर की गई थी किसी की हत्या..
और पहले ये हुआ करता था,उस लिखावट का एक हिस्सा,
जिस पर लिखा था "यहाँ पेशाब करना मना है"
पत्थरों(१) को पूजकर,
पत्थर(२) बरसाते परस्पर, ये पत्थर(३),
इन पत्थरों की चोट,
बहुत गहरी होती है,
सदियों तक अमिट रहने वाली,
कलंकित करने वाली...
हाँ, कलंकित कर जाती है ये,
मेरे शहर को, मेरे देश को,
और भ्रम पैदा कर जाती है,
कठोर पत्थर की चोट,
उस मासूम के कोमल मन पर,
जो पढ़ रहा है किताब की वो लकीर,
जहाँ लिखा है,
"आपस में है भाई भाई"
कौन?
कौन है आपस में भाई-भाई?
ये पत्थर जो चोट पहुंचाते हैं एक दूसरे को?
जो बस्तियां जला देते हैं, बात बात पर
जो लूटते हैं घरों को, जात पात पर
जो धर्म की घृणा के नाम पर,करते हैं बलात्कार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार....
ये पत्थर पहले इंसान ही बन जाएँ
फिर बने-या-ना-बने भाई-भाई
क्या फर्क पड़ता है, दुश्मन ना बने बस,
हाँ, बस ये दुश्मन ना बने,
फिर शायद, वो पत्थर भी शर्मिंदा ना होगा,
जो शर्मिंदा है..अपने द्वारा किसी के कुचले जाने से,
जो शर्मिंदा है..किसी के मौत का कारण बन जाने से,
जिसे अपने होने पर, पहले से ही पछतावा था,
और अब अपनी दरिंदगी पर,करना चाहता है वह आत्महत्या
ये वही पत्थर है.. जिससे कुचलकर की गई थी किसी की हत्या..
और पहले ये हुआ करता था,उस लिखावट का एक हिस्सा,
जिस पर लिखा था "यहाँ पेशाब करना मना है"
Wednesday, January 20, 2010
सवालिया भगवान
अपनी ही जिंदगी से परेशान क्यों है
हर शख्स खुद से अनजान क्यों है
इंसानियत कहाँ गई इतनी दूर चलकर,
इस सवाल पर चुपचाप खड़ा इन्सान क्यों है?
वक़्त मुंह फेरे खड़ा है, हवा भी उलटी दिशा में,
धरती फट पड़ी और रो रहा आसमान क्यों हैं?
हर तरफ खून के कतरे और गोलियां दनादन,
मेरे वतन की गलियां यूँ सुनसान क्यों हैं?
न सवाल ही रहा कोई, न जवाब बाकि रहा,
सवालिया बना अब भी देख रहा भगवान क्यों है?
हर शख्स खुद से अनजान क्यों है
इंसानियत कहाँ गई इतनी दूर चलकर,
इस सवाल पर चुपचाप खड़ा इन्सान क्यों है?
वक़्त मुंह फेरे खड़ा है, हवा भी उलटी दिशा में,
धरती फट पड़ी और रो रहा आसमान क्यों हैं?
हर तरफ खून के कतरे और गोलियां दनादन,
मेरे वतन की गलियां यूँ सुनसान क्यों हैं?
न सवाल ही रहा कोई, न जवाब बाकि रहा,
सवालिया बना अब भी देख रहा भगवान क्यों है?
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