विस्तारित ये काली रात,
शोक संताप का अंधकार,
प्रभात पर लगा प्रश्नचिन्ह,
अनुत्तरित ये सृष्टि सारी,
क्यों सोई है निश्चिन्त,
पदचाप कर्ण पर उभरे हैं,
कुछ आने के, कुछ जाने के,
संशय मन में छिपे हुए हैं,
जीवन को भरमाने के,
चन्द्र किरणे हैं, ओझल क्यों,
पवन चली है, बोझल क्यों,
क्यों नदियाँ सारी है, चुपचाप,
सागर क्यों गंभीर हैं आज,
अंधकार में डटे हुए,
उलूक के फड-फड पाँखो में,
भय व्याप्त सारा है जग में,
और ताने हुए उन साखों में,
कुछ छनों पूर्व ही फैले जो,
आकाश की सुन्दर बांहों में,
मैं भी हूँ अंधकार से व्याकुल,
अधना सा जीव सृष्टि का,
अंध बिंदु कर समा गया,
मुझे अंधकार जो सिन्धु सा...
wah wah
ReplyDeleteमैं भी हूँ अंधकार से व्याकुल,
अधना सा जीव सृष्टि का,
अंध बिंदु कर समा गया,
मुझे अंधकार जो सिन्धु सा.