Wednesday, November 20, 2013

खुदखुशी


खुश नहीं था वह खुद कि जिंदगी से,

खुदखुशी कर ली उसने,

मगर खुछ याद है मुझे,

अख़बार में "अग्निदग्धा की मौत" लिखे जाने से पहले,

उसने कहा थे कापते होठो से..."बचा लो मुझे"।
                                      

Friday, June 28, 2013

मौसम बीत गए ऐसे ही, बिन जामुन बिन आम

विस्तारों में खो गया , जीवन और संसार,
खोजा कुछ भी ना मिला, कहते जिसको सार,

कल की खातिर मार ना मन ये, कल ना आये काम,
मौसम बीत गए ऐसे ही, बिन जामुन बिन आम,

कल कल में ये उमर खो गई, खो गए सारे मीत,
सा-रे गा, ही ना रहे, क्या स्वर क्या संगीत?

सुबह से लेकर शाम बेचते, बन गई ऐसी बात,
उगता सूरज कब देखा था, रहा नहीं ये याद,

मिलने की बस लालच में, तरसे जाते नैन,
कैद हुए तस्वीरों में वो, नैन हुए बेचैन,

ऐसा होता , वैसा होता, दिन वो भी थे खास,
चारपाई में लेटे   होते , आँखों भरा आकाश,

थोडा थोडा करते करते, जग में जागे आस,
जग ना है ये जादूगर है, बढती जाये प्यास,




Wednesday, June 19, 2013

आज , कल-कब?


समय की कोमल सी रेशें,
बुनती सांसों के चितेरे,
स्वप्न के किरचे बिखेरे,
नींद के उन्मादी फेरे,

मन की अवनि पर लगे हैं,
अभिलाषा के कोपल सुनहरे,
जुगनू से आभास होते,
छोटे छोटे आस सोते ,

आस के विश्वास पर,
और, सखा वृन्द परिहास पर,
जीते चलो , दुःख को दलते ,


ब्यस्त जीवन,खुद का न, मन-तन ,
आप विक्रय कर चले,
स्वयं पर अभिसार को,

बूंद बारिश, हवा शीतल,
देख तरसे, मन ना बरसे,
जीत कहते, स्वयं हार को?

रुक ठहर जा, अब सुधर जा,
परिवर्तित हो, कुछ बदल जा,
करो हिम्मत , थोडा जी लो,
फेंको, छतरी, गीले हो, लो,

माप दंड, ब्यापार में होते,
जीवन तो उद्दंड है होता,
समय में मत बांधो दिन को,
दिनकर के क्या दास तुम हो,
कोई हँसता नेपथ्य में,अरे,
नाट्य का परिहास तुम हो?

स्वयं ही फेंको लकीरे,
मस्त होकर ब्योम में,
इन्द्रधनुषी देखो सपने,
कर, कहे जो मन ये तेरा,
जी ले अब कुछ,
दिन रात के छोड़ फेरे,
ये नहीं हैं तेरे मेरे,

बहुत कुछ है, परे इनके,
ख़ुशी छोटी, बड़ी यादें,
बातों से जो बनती बातें,
हैं छणिक सब, आज , कल-कब?
बस यही है, कणी सी है,
मोल इसका?, मणि सी है,
जी ले इसको, बीती जाती
कल नहीं कुछ, बस यही हैं,
कल नहीं कुछ, बस यही हैं,

Thursday, May 23, 2013

ना जाने क्यों?

तांक कर धागा हमारी यादों का तुमने,
जो एक सुई अपनी ऊँगली में चुभा ली, गलती से फिर भी,
की वो सुई अब तलक तो ना सम्हाले रखा होगा पर,
नजर तो जख्म पर जाती ही होगी, झूठ ना कहना,

ना कहना झूठ कि चुपचाप जब भी तुम संवरती थी,
तो फिर जुल्फों की आवारगी, खुद कैसे बिखरती थी,
और वो, आइना जिसे कहती है दुनिया यूँ ही अनजाने,
होती सामने तू, अक्स पर मेरा दिखाता था,

कहें क्या अक्स को लेकर, धुप के टुकड़े से पूछो तुम,
की जब देखता है वो मुझको तुम हमेशा पास होती हो,
कभी बारिश कभी बंजर, ये छुट-ते मंजर,
मगर अब भी कहानी है, जाने किसकी जुबानी है,

जुबानी मेरी या तेरी, कहो क्या फर्क पड़ता है,
उस रोज पुराने चौखट के इस पार आकर,
कहा था मैंने - ध्यान रख अपना,
मगर तू छोड़ने आई थी मुझको, मेरे बिन छूटे,
तभी बस चुभ गई थी सुई, अटकी धागे में कोई,

पता नहीं मुझको अब तक,
तुझे क्या है पता ये?
ना भी हो शायद,
की मोड़ के उस पार आकर,
दूर बहुत दूर जाकर,
गुम हो कर, तलाशो में ही अपनी मैं,
आज भी अटका हूँ , उसी धागे में,
उसी चौखट पर, उसी अक्स में,
उसी आईने में, उसी दुनिया में,
ना जाने क्यों?

Friday, May 10, 2013

हासिल


गप्पे बाजी, भागम भाग में रातें यूँ ही कट जाती थी,
वो भी  एक दौर था , रतजगे जब होते थे
पूरी दुनिया सोती थी, हम ख्वाबों में खोते थे,
अपनी दुनिया, जागती आँखे, "कल" की सजावट होती थी,
ये "आज" उस कल का ही दर्पण है,

ऊँचें ख्वाब जो आज बन गए,
गप्पें सारे  वक़्त में सन गए,
कल का प्रश्न ? या आज का प्रहसन ?
अभिनय मेरा, ये ही जीवन,

ये भी एक दौर है, आज बना मौन है,
मौन, गंभीर,स्थिर और अकाट्य,
"आज", कितना खामोश, चुपचाप गुमनाम,

हासिल क्या हुआ मुझे?
एक संवेदनहीन वर्तमान,
एक संवेदनहीन वर्तमान,