Thursday, May 23, 2013

ना जाने क्यों?

तांक कर धागा हमारी यादों का तुमने,
जो एक सुई अपनी ऊँगली में चुभा ली, गलती से फिर भी,
की वो सुई अब तलक तो ना सम्हाले रखा होगा पर,
नजर तो जख्म पर जाती ही होगी, झूठ ना कहना,

ना कहना झूठ कि चुपचाप जब भी तुम संवरती थी,
तो फिर जुल्फों की आवारगी, खुद कैसे बिखरती थी,
और वो, आइना जिसे कहती है दुनिया यूँ ही अनजाने,
होती सामने तू, अक्स पर मेरा दिखाता था,

कहें क्या अक्स को लेकर, धुप के टुकड़े से पूछो तुम,
की जब देखता है वो मुझको तुम हमेशा पास होती हो,
कभी बारिश कभी बंजर, ये छुट-ते मंजर,
मगर अब भी कहानी है, जाने किसकी जुबानी है,

जुबानी मेरी या तेरी, कहो क्या फर्क पड़ता है,
उस रोज पुराने चौखट के इस पार आकर,
कहा था मैंने - ध्यान रख अपना,
मगर तू छोड़ने आई थी मुझको, मेरे बिन छूटे,
तभी बस चुभ गई थी सुई, अटकी धागे में कोई,

पता नहीं मुझको अब तक,
तुझे क्या है पता ये?
ना भी हो शायद,
की मोड़ के उस पार आकर,
दूर बहुत दूर जाकर,
गुम हो कर, तलाशो में ही अपनी मैं,
आज भी अटका हूँ , उसी धागे में,
उसी चौखट पर, उसी अक्स में,
उसी आईने में, उसी दुनिया में,
ना जाने क्यों?

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