Thursday, July 9, 2015

माँ, करूँ तुझपे क्या अर्पण

शुन्य सा व्याकुल विकल था,
सामने ना कोई हलचल,

तूने लाया था  जहाँ में,
मेरा सबकुछ तेरा पल पल,

मेरी सांसो को जगाया, 
मुझको आँचल में सुलाया,

मैं तो था कुछ भी नहीं माँ ,
तूने ही मुझको बनाया,


रतजगा कितना किया है,
मेरे लिए तूने जिया है,

माँ , करूँ तुझपे क्या अर्पण?
मेरा सबकुछ तेरा दिया है. 

Monday, July 6, 2015

अगर मैं रास्ता होता

दुआएं कैसे दूँ मैं तुम्हें सारे ज़माने की,
पता है? मेरी दुआओं का असर नहीं होता,

फिर भी कहता की पाओ हर ख़ुशी को तुम,
अगर मैं आसमां  में बैठा कोई खुदा होता,

तुमने पूछा  था कभी, तन्हाई में क्यों रहते हो,
बता देता तुम्हें सबकुछ अगर मैं दास्ताँ होता,

हर मंजिल पे तेरा नाम हो, हर चाहत हो पूरी,
बिछा  देता मैं खुद पे फूल अगर मैं रास्ता होता 
        (मूल रचना २०-जुलाई-२००४)