Tuesday, April 28, 2009

दायरा


(१)


एक बड़ा सा शहर, और मेरे ऑफिस की बहुमंजिली ईमारत,


तीसरे माले पर दीवार से सटा , मेरा डेस्क ,


डेस्कटॉप, पेन होल्डर, प्लानर और न जाने क्या क्या ,


मेरा अपना दायरा,


हाँ मेरा अपना दायरा, मेरे ऑफिस की दुनिया,


(२)


मैं ब्यस्त था अपने कामों में,


अचानक, बाहर बारिश होने लगी थी,


बुँदे दीवार पर ग्लास को भिगोने लगी थी,


बूंदों का फिसलना , ग्लास पर अठखेलियाँ करना ,


और फिर नीचे गिर जाना ,


जैसे जिंदगी के तस्वीर में कई रंग उभर आना,


रंग वो बचपन का ,


जब गलियों के बहते पानी में नाव चलते थे,


छत के गिरते पानी से ख़ुद को भिगाते थे,


ठण्ड से ठिठुरना, और गीली लकडियों की आग,


और माँ के डाट डपट से , लुका छिपी और भागम भाग,


तभी फ़ोन की घंटी ने मुझे ख्यालों से जगाया,


कोड के डिलिवरी है ये याद दिलाया


(३)


तब तक ग्लास से वो बूंदें फिसल चुकी थीं,


मेरी यादें सहम के कही सिमट चुकी थीं,


मेरा बचपन , वो गाँव की गलियां ,


बच्चों की आवाजें, माँ की डाट डपट ,


भीगता आँगन, छत का गिरता पानी,


सब कुछ सिमट गए थे,


सहम से गए थे, मानो छुप गए हो कहीं


मेरे डेस्क के इर्द-गिर्द,


मेरे ही दायरे में मेरा बचपन कहीं खो सा गया था,


या शायद, dustbin में पड़े कागज की तरह बिखर गया था


(४)


थोड़ा अँधेरा, काम ख़त्म आज का, मैं घर के रस्ते में था,


फिर वही लोग, दौड़ते भागते, घर को लौटते


बहुत से उदास दायरे,


थके हुए चेहरे, कल की तस्वीरें,


इन सबको चीरता मैं भी, पर इनमे शामिल था,


अचानक तेज बरसात होने लगी थी,


मन की आशाओं की भिगोने लगी थी,


इस बार मैं भीड़ से अलग थलग,


भीगता जा रहा था, जान बुझकर ,


देखता रहा, बारिश की बूंदों को उँगलियों के पोरों पर फिसलते,


कभी अपने चेहरे से लिपटते,


मैं इस कदर ख़ुद को भीगाने लगा था,


खोई छोटी छोटी खुशियाँ, फिर पाने लगा था,


कितना बड़ा था मेरा दायरा इस बार,


और कितनी बड़ी थी मेरी दुनिया......कितनी बड़ी है मेरी दुनिया।



Saturday, January 17, 2009

युद्ध - स्वयं से




एक युद्ध छिड़ा है, अंतर्मन में,
हाँ ये युद्ध है , स्वयं से,

ये युद्ध है,
अपने आज से, बीते उस कल से,
सांसो के हर करवट पर, गुजरते पल-पल से,
युद्ध अपनी सीमाओं से, रीती से परम्पराओं से,
दुर्भेद्य मन की दीवारों से,
कहीं पाप से तो कहीं अत्याचारों से,

ये युद्ध है,
कुछ परायों के संग अपनों से,
जो न बन पाई हकीकत, उन अधूरे सपनो से,
हाँ ये युद्ध है, एक अनजाने भ्रम से,
जो ख़त्म हो चुका, उस टूटे जीवन के क्रम से,
ये युद्ध है, मन को हराने वाली यादों से,
जो बिगड़ चुकी कब से, उन अनमनी बातो से,

पर.............
सोचकर इस युद्ध के परिणाम को,
अक्सर मैं, शंकित हो जाता हूँ,
जीतता हूँ, तो भी स्वयं को अकेला ही पाता हूँ,
कौन रहेगा मेरे साथ,
जो साथ हैं, वो समय की बाढ़ में बह जायेंगे,
मेरे आधुनिक विचार, भी तो,
वृद्ध और क्षीण कहलायेंगे,
स्वप्नों के रंग भी तो,
फीके पड़ जायेंगे,
पापी और अत्याचारी, भी गल सड़ जायेंगे,
जब इस युद्ध में ही मेरी हार होगी,तो मैं युद्ध की भाषा क्यों गढ़ रहा हूँ,
एक अनजाने युद्ध में, योद्धाओं की तरह क्यों लड़ रहा हूँ॥

Friday, January 16, 2009

आदमी




सूरज को छूने की चाह में,


उसकी उँगलियाँ जल गई,


उम्र को जीने की ललक में,


पूरी जिंदगी निकल गई,


रोज मापता दूरी,


सुबह से शाम की,


अंत में पैमाना ही टूट गया,


ना रहा सूर्योदय,ना सूर्यास्त,


आदमी दोनों के बीच कहीं छूट गया।

Tuesday, June 3, 2008

कुछ भी तो नही बदलता,

कुछ भी तो नही बदलता,

सुबह से शाम तक,

ऑफिस को जाने से ऑफिस से आने तक,

चाय की प्याली से डिनर की थाली तक ,

कुछ भी तो नही बदलता, सुबह से शाम...

२.

वही अस्त - व्यस्त सा कमरा , बिखरा अख़बार

समेटे उलझी घटनाये , और मृत संवेदनाये ,

वही कमरे की चारदीवारी,

सुबह जैसी , अभी भी वैसी,

चुपचाप मौन, अपलक मुझे निहारती,

३।

वो रास्ता, जो रोज ख़त्म होकर भी,

रोज फिर शुरु हो जाता है,

और गली का का वो कुत्ता,

जो थोड़ा गुर्राता है , और फिर थककर सो जाता है,

कुछ भी तो नही बदलता, सुबह से शाम...

४।

कुछ भी तो नही बदलता,

आदमी भी वही, और उसकी परिभाषा भी,

हाँ ये सच है, की अभिलाषाएं थोडी घट -बढ़ जाती हैं,

कुछ रस्ते में ही बिखर जाती हैं,

और कुछ पुरी होकर, ख़त्म हो जाती हैं,

५.

जिंदगी का एक दिन , हाथ से फिसल जाता है,

सवरने की तलाश में, टूटकर बिखर जाता है,

कई आशाएं, जिंदा ही दफन हो जाती है,

कई सपने , दिवास्पन रह जाते हैं,

कुछ यादें मन का दरवाजा खटखटाकर ,

खली हाथ लौट जाती हैं,

और कई संवेदनाये , जिंदगी की व्यस्तता देख ,

अलविदा कह जाती है,

६।

कई ख्वाब बदल जाते हैं,

कई लम्हे गुजर बदल जाते हैं,

कई यादें सिमट जाती हैं,

कई यादें बिखर जाती हैं,

एक वक्त बदल जाता है,

उम्र बदल जाती है,

कुछ साथी बिछर जाते हैं,

कुछ रिश्ते उलझ जाते हैं,

सूरज भी बदल जाता है,

तारीख बदल जाती है,

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क्या क्या ना बदलता है,

सुबह से शाम तक, (repeat above two lines two times)

नही बदलता तो बस मेरा ये ख्याल,

जो अब भी यही कहता है,

कुछ भी तो नही बदलता, सुबह से शाम तक