विस्तारित ये काली रात,
शोक संताप का अंधकार,
प्रभात पर लगा प्रश्नचिन्ह,
अनुत्तरित ये सृष्टि सारी,
क्यों सोई है निश्चिन्त,
पदचाप कर्ण पर उभरे हैं,
कुछ आने के, कुछ जाने के,
संशय मन में छिपे हुए हैं,
जीवन को भरमाने के,
चन्द्र किरणे हैं, ओझल क्यों,
पवन चली है, बोझल क्यों,
क्यों नदियाँ सारी है, चुपचाप,
सागर क्यों गंभीर हैं आज,
अंधकार में डटे हुए,
उलूक के फड-फड पाँखो में,
भय व्याप्त सारा है जग में,
और ताने हुए उन साखों में,
कुछ छनों पूर्व ही फैले जो,
आकाश की सुन्दर बांहों में,
मैं भी हूँ अंधकार से व्याकुल,
अधना सा जीव सृष्टि का,
अंध बिंदु कर समा गया,
मुझे अंधकार जो सिन्धु सा...
कुछ इस कदर हुई, मेरी दुआ कबूल, असर होने की उम्र उनकी, मेरी उम्र से लंबी थी।
Sunday, May 9, 2010
Monday, May 3, 2010
समय के पंख
समय पंख लगाकर उड़ गया,
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,
अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,
अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..
Friday, April 2, 2010
तीन पत्थर
( हैदराबाद में अप्रैल.१० के कौमी दंगो पर )
पत्थरों(१) को पूजकर,
पत्थर(२) बरसाते परस्पर, ये पत्थर(३),
इन पत्थरों की चोट,
बहुत गहरी होती है,
सदियों तक अमिट रहने वाली,
कलंकित करने वाली...
हाँ, कलंकित कर जाती है ये,
मेरे शहर को, मेरे देश को,
और भ्रम पैदा कर जाती है,
कठोर पत्थर की चोट,
उस मासूम के कोमल मन पर,
जो पढ़ रहा है किताब की वो लकीर,
जहाँ लिखा है,
"आपस में है भाई भाई"
कौन?
कौन है आपस में भाई-भाई?
ये पत्थर जो चोट पहुंचाते हैं एक दूसरे को?
जो बस्तियां जला देते हैं, बात बात पर
जो लूटते हैं घरों को, जात पात पर
जो धर्म की घृणा के नाम पर,करते हैं बलात्कार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार....
ये पत्थर पहले इंसान ही बन जाएँ
फिर बने-या-ना-बने भाई-भाई
क्या फर्क पड़ता है, दुश्मन ना बने बस,
हाँ, बस ये दुश्मन ना बने,
फिर शायद, वो पत्थर भी शर्मिंदा ना होगा,
जो शर्मिंदा है..अपने द्वारा किसी के कुचले जाने से,
जो शर्मिंदा है..किसी के मौत का कारण बन जाने से,
जिसे अपने होने पर, पहले से ही पछतावा था,
और अब अपनी दरिंदगी पर,करना चाहता है वह आत्महत्या
ये वही पत्थर है.. जिससे कुचलकर की गई थी किसी की हत्या..
और पहले ये हुआ करता था,उस लिखावट का एक हिस्सा,
जिस पर लिखा था "यहाँ पेशाब करना मना है"
पत्थरों(१) को पूजकर,
पत्थर(२) बरसाते परस्पर, ये पत्थर(३),
इन पत्थरों की चोट,
बहुत गहरी होती है,
सदियों तक अमिट रहने वाली,
कलंकित करने वाली...
हाँ, कलंकित कर जाती है ये,
मेरे शहर को, मेरे देश को,
और भ्रम पैदा कर जाती है,
कठोर पत्थर की चोट,
उस मासूम के कोमल मन पर,
जो पढ़ रहा है किताब की वो लकीर,
जहाँ लिखा है,
"आपस में है भाई भाई"
कौन?
कौन है आपस में भाई-भाई?
ये पत्थर जो चोट पहुंचाते हैं एक दूसरे को?
जो बस्तियां जला देते हैं, बात बात पर
जो लूटते हैं घरों को, जात पात पर
जो धर्म की घृणा के नाम पर,करते हैं बलात्कार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार....
ये पत्थर पहले इंसान ही बन जाएँ
फिर बने-या-ना-बने भाई-भाई
क्या फर्क पड़ता है, दुश्मन ना बने बस,
हाँ, बस ये दुश्मन ना बने,
फिर शायद, वो पत्थर भी शर्मिंदा ना होगा,
जो शर्मिंदा है..अपने द्वारा किसी के कुचले जाने से,
जो शर्मिंदा है..किसी के मौत का कारण बन जाने से,
जिसे अपने होने पर, पहले से ही पछतावा था,
और अब अपनी दरिंदगी पर,करना चाहता है वह आत्महत्या
ये वही पत्थर है.. जिससे कुचलकर की गई थी किसी की हत्या..
और पहले ये हुआ करता था,उस लिखावट का एक हिस्सा,
जिस पर लिखा था "यहाँ पेशाब करना मना है"
Wednesday, January 20, 2010
सवालिया भगवान
अपनी ही जिंदगी से परेशान क्यों है
हर शख्स खुद से अनजान क्यों है
इंसानियत कहाँ गई इतनी दूर चलकर,
इस सवाल पर चुपचाप खड़ा इन्सान क्यों है?
वक़्त मुंह फेरे खड़ा है, हवा भी उलटी दिशा में,
धरती फट पड़ी और रो रहा आसमान क्यों हैं?
हर तरफ खून के कतरे और गोलियां दनादन,
मेरे वतन की गलियां यूँ सुनसान क्यों हैं?
न सवाल ही रहा कोई, न जवाब बाकि रहा,
सवालिया बना अब भी देख रहा भगवान क्यों है?
हर शख्स खुद से अनजान क्यों है
इंसानियत कहाँ गई इतनी दूर चलकर,
इस सवाल पर चुपचाप खड़ा इन्सान क्यों है?
वक़्त मुंह फेरे खड़ा है, हवा भी उलटी दिशा में,
धरती फट पड़ी और रो रहा आसमान क्यों हैं?
हर तरफ खून के कतरे और गोलियां दनादन,
मेरे वतन की गलियां यूँ सुनसान क्यों हैं?
न सवाल ही रहा कोई, न जवाब बाकि रहा,
सवालिया बना अब भी देख रहा भगवान क्यों है?
Friday, October 2, 2009
मेरी त्रिवेणी-1
(१)
काले स्याह सा अँधेरा, कुछ जगमगाते जुगनू,
कुछ जागते परिंदे, कुछ खड़कते पत्ते
बिना "आहट" किये मुमकिन नहीं रौशनी का आना...
(२)
शरमा जाती है, जमीन कुरेदती वो पावों के अंगूठे से,
घबरा जाती है, वो छुपती हुई परदे के पीछे से,
जिन्दगी है, अभी तक अपनी ना हुई...
(3 )
पतझड़ में दरख्त के पत्ते बिखर गए,
कल तक साथ थे जो साखों के संग,
वक़्त के साथ रिश्ते छुट जाते हैं
काले स्याह सा अँधेरा, कुछ जगमगाते जुगनू,
कुछ जागते परिंदे, कुछ खड़कते पत्ते
बिना "आहट" किये मुमकिन नहीं रौशनी का आना...
(२)
शरमा जाती है, जमीन कुरेदती वो पावों के अंगूठे से,
घबरा जाती है, वो छुपती हुई परदे के पीछे से,
जिन्दगी है, अभी तक अपनी ना हुई...
(3 )
पतझड़ में दरख्त के पत्ते बिखर गए,
कल तक साथ थे जो साखों के संग,
वक़्त के साथ रिश्ते छुट जाते हैं
Saturday, September 26, 2009
एक पुरानी गजल
दुआओं से ही रात है, दुआओं से ही सुबह होती है,
कोई हिचकियाँ लेता है कही,दूर किसी को ख़बर होती है,
नसीब क्या है?कहाँ है ? ये मुझको नही पता,
पर, लगता है जैसे, ये भी कोई चीज होती है,
मुझ पर क्या असर करेंगी, ये बला की हवायें
माँ की दुआये तो ताबीज होती हैं,
हमारे रस्ते पर, मंजिलो के निशान है "उमा"
जिस राह में हम चले नही, वो बदनसीब होती है
Thursday, August 13, 2009
अहसास
कभी कड़ी, दोपहरी में,
बैठे हों फुरसत से,घर के भीतर,
पंखे के नीचे, थोड़ा सुस्ताते
या कूलर के आगे, थोड़ा अलसाते,
और एक छोटी सी चिडिया,
पी जाए पानी,
जो फर्श पर गिरा था,
अनजाने किसी से,
और उड़ जाए फुर्र से, थोड़ा डरते-डरते,
तो पूछो ये ख़ुद से , ये अहसास क्या है......
बारिश में छतरी की नीचे,
खड़े हों चुपचाप,
बूंदों से बचते-बचते,
और दिख जाए कोई बच्चा भीगता चिल्लाता
बारिश के गीत गाते,
और गुदगुदा जाए मन को,
तो पूछो ये ख़ुद से,ये अहसास क्या है.........
बैठे हों फुरसत से,घर के भीतर,
पंखे के नीचे, थोड़ा सुस्ताते
या कूलर के आगे, थोड़ा अलसाते,
और एक छोटी सी चिडिया,
पी जाए पानी,
जो फर्श पर गिरा था,
अनजाने किसी से,
और उड़ जाए फुर्र से, थोड़ा डरते-डरते,
तो पूछो ये ख़ुद से , ये अहसास क्या है......
बारिश में छतरी की नीचे,
खड़े हों चुपचाप,
बूंदों से बचते-बचते,
और दिख जाए कोई बच्चा भीगता चिल्लाता
बारिश के गीत गाते,
और गुदगुदा जाए मन को,
तो पूछो ये ख़ुद से,ये अहसास क्या है.........
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