Wednesday, January 20, 2010

सवालिया भगवान

अपनी ही जिंदगी से परेशान क्यों है
हर शख्स खुद से अनजान क्यों है

इंसानियत कहाँ गई इतनी दूर चलकर,
इस सवाल पर चुपचाप खड़ा इन्सान क्यों है?

वक़्त मुंह फेरे खड़ा है, हवा भी उलटी दिशा में,
धरती फट पड़ी और रो रहा आसमान क्यों हैं?

हर तरफ खून के कतरे और गोलियां दनादन,
मेरे वतन की गलियां यूँ सुनसान क्यों हैं?

न सवाल ही रहा कोई, न जवाब बाकि रहा,
सवालिया बना अब भी देख रहा भगवान क्यों है?

2 comments:

  1. it touches the heart & makes you question yourself. Good one Uma. Keep it up!!!

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  2. Abe ye Sher Shayari ko chhodo development karo............................:)

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