Monday, May 3, 2010

समय के पंख

समय पंख लगाकर उड़ गया,
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,

अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..

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