Sunday, August 14, 2011

लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में


समय झकझोर कर रख दो, पलटकर मोड़ कर रख दो,
बदल लो करवटे अब तुम, ये आलस तोड़ कर रख दो,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में,
बढ़ो अब तोड़ किनारों को, नहीं तो क्या रवानी में,

बहुत है फैला अँधियारा, लगा दो दांव अब सारा,
दिवाकर ना मिले तो क्या, स्वयं तुम हर लो तम सारा,
यही है वक़्त लड़ने का, बदलने का, ना डरने का,
मिला लो स्वर में स्वर मेरे, लगा सिंहनाद सा नारा,
नहीं तो क्या बताओगे, तुम आने वाली पुश्तों को,
कहाँ तुम खुद को पाओगे ,
ना ही हकीकत में, और ना कहानी में,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में,
बढ़ो अब तोड़ किनारों को, नहीं तो क्या रवानी में,

समय है रूद्र बनने का , समय ये तांडव करने का,
समय ये लहू उबलने का, समय ये कुछ तो करने का,
जो खामोश बैठोगे, तो कैसे क्रांति गायन हो ?
रूद्र की संतान बनो, हिंद के जवान बनो,
कहीं ये घडी बीत ना जाये, फिर से नादानी में,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में...

Saturday, February 5, 2011

आशा और निराशा

दूर से दिखना उजाला,

रोशनी का यूँ तो आना,

इससे पहले ना हुआ,

किसने आकर यूँ छुआ,

कि रोम भी कुछ कह उठे,

जल गए सारे दिए जो,

बुझ गए थे युगों तक,

फिर अप्सरा कोई लगी,

एक ख़ुशी कि तार थी जो,

पर अचानक एक दानव,

प्रकट यूँ होने लगा,

जागा शिशु वो अचानक,

चुप था जो , रोने लगा,

वो अप्सरा जाने गई कब?

तार भी टूटा सा था,

बस अंधकार था वहां,

ना रौशनी का नाम था

Sunday, January 16, 2011

मेरे सपने

सूरज की रौशनी में,
मुझे घूरते सफ़ेद बगुले,
छितिज* से आ रहे,
पंख फड-फडाते,
घबरा सा जाता हूँ मैं,
अक्सर ही देखकर,
चेहरे भयानक इनके,
फिर,
सोचता हूँ अचानक,
इनके साये तो रात में भी आये थे,
जीवन के कुछ गीत,
हमने संग संग गाये थे,
फिर रात के ढलने पर,
ये डरावने क्यों हो गये,
मेरे सपने हकीकत में नहीं बदले,
न जाने कहाँ खो गये..
न जाने कहाँ खो गये..
(रचना-२२-०७-१९९९)