Saturday, February 5, 2011

आशा और निराशा

दूर से दिखना उजाला,

रोशनी का यूँ तो आना,

इससे पहले ना हुआ,

किसने आकर यूँ छुआ,

कि रोम भी कुछ कह उठे,

जल गए सारे दिए जो,

बुझ गए थे युगों तक,

फिर अप्सरा कोई लगी,

एक ख़ुशी कि तार थी जो,

पर अचानक एक दानव,

प्रकट यूँ होने लगा,

जागा शिशु वो अचानक,

चुप था जो , रोने लगा,

वो अप्सरा जाने गई कब?

तार भी टूटा सा था,

बस अंधकार था वहां,

ना रौशनी का नाम था

No comments:

Post a Comment

Give your comments here