Sunday, January 16, 2011

मेरे सपने

सूरज की रौशनी में,
मुझे घूरते सफ़ेद बगुले,
छितिज* से आ रहे,
पंख फड-फडाते,
घबरा सा जाता हूँ मैं,
अक्सर ही देखकर,
चेहरे भयानक इनके,
फिर,
सोचता हूँ अचानक,
इनके साये तो रात में भी आये थे,
जीवन के कुछ गीत,
हमने संग संग गाये थे,
फिर रात के ढलने पर,
ये डरावने क्यों हो गये,
मेरे सपने हकीकत में नहीं बदले,
न जाने कहाँ खो गये..
न जाने कहाँ खो गये..
(रचना-२२-०७-१९९९)

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