Friday, May 10, 2013

हासिल


गप्पे बाजी, भागम भाग में रातें यूँ ही कट जाती थी,
वो भी  एक दौर था , रतजगे जब होते थे
पूरी दुनिया सोती थी, हम ख्वाबों में खोते थे,
अपनी दुनिया, जागती आँखे, "कल" की सजावट होती थी,
ये "आज" उस कल का ही दर्पण है,

ऊँचें ख्वाब जो आज बन गए,
गप्पें सारे  वक़्त में सन गए,
कल का प्रश्न ? या आज का प्रहसन ?
अभिनय मेरा, ये ही जीवन,

ये भी एक दौर है, आज बना मौन है,
मौन, गंभीर,स्थिर और अकाट्य,
"आज", कितना खामोश, चुपचाप गुमनाम,

हासिल क्या हुआ मुझे?
एक संवेदनहीन वर्तमान,
एक संवेदनहीन वर्तमान,
          

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