Saturday, August 23, 2014

मैं भी कुछ अलग नहीं

सुबह का अख़बार,
चाय का कप
नाश्ते की प्लेट,
सामूहिक बलात्कार,
फिर नृशंस हत्या की खबर,

रोज वाली बस,
फिर वही काम काज,
ब्यस्त सा दिन,
ख़त्म फिर दिन,
ख़त्म फिर रात,

दूसरा दिन,
नया अख़बार,
नई ख़बरें,
मृत ह्रदय,

रोज वाली बस,,
और बस में  सफर करते, 
कई नर मुंड,
एक जोड़ी हाथ-पैरो के साथ,
अंधी आँखों के साथ,
गूंगे, जुबान के साथ,
मांस के  टुकड़ों, से जुड़े,

चले जा रहे हैं,
मृत ह्रदय लेकर,
दिन शुरू करके, 
फिर  ख़त्म करने,
मैं भी कुछ अलग नहीं। … 












Sunday, August 10, 2014

अबला


विषदंत अगर मैं होता तो ,
ना नैन तेरे कातर  होते,
अस्मत के लूटे जाने पर,
ना हाथ बांध ये नर सोते,

ना, कोई तुझे अबला कहता,
ना कहता कोई बेचारी,
मैं नीलकंठ सा बन जाता,
पी लेता, जो विष प्याले होते,

पुरुष की काली सत्ता पर,
अब तक चुप रहता युग क्यों है,
क्यों, नारी की पूजा करता -छलता
ये छद्म सा  कलयुग है,

ये समाज है,
बस, नर मुंडो का,
पीड़ित, छलित,
लाशो की सड़ती झुंडों  का,
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