विषदंत अगर मैं होता तो ,
ना नैन तेरे कातर होते,
अस्मत के लूटे जाने पर,
ना हाथ बांध ये नर सोते,
ना, कोई तुझे अबला कहता,
ना कहता कोई बेचारी,
मैं नीलकंठ सा बन जाता,
पी लेता, जो विष प्याले होते,
पुरुष की काली सत्ता पर,
अब तक चुप रहता युग क्यों है,
क्यों, नारी की पूजा करता -छलता
ये छद्म सा कलयुग है,
ये समाज है,
बस, नर मुंडो का,
पीड़ित, छलित,
लाशो की सड़ती झुंडों का,
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