खुश नहीं था वह खुद कि जिंदगी से,
खुदखुशी कर ली उसने,
मगर खुछ याद है मुझे,
अख़बार में "अग्निदग्धा की मौत" लिखे जाने से पहले,
उसने कहा थे कापते होठो से..."बचा लो मुझे"।
कुछ इस कदर हुई, मेरी दुआ कबूल, असर होने की उम्र उनकी, मेरी उम्र से लंबी थी।
दूर से दिखना उजाला,
रोशनी का यूँ तो आना,
इससे पहले ना हुआ,
किसने आकर यूँ छुआ,
कि रोम भी कुछ कह उठे,
जल गए सारे दिए जो,
बुझ गए थे युगों तक,
फिर अप्सरा कोई लगी,
एक ख़ुशी कि तार थी जो,
पर अचानक एक दानव,
प्रकट यूँ होने लगा,
जागा शिशु वो अचानक,
चुप था जो , रोने लगा,
वो अप्सरा जाने गई कब?
तार भी टूटा सा था,
बस अंधकार था वहां,
ना रौशनी का नाम था