( हैदराबाद में अप्रैल.१० के कौमी दंगो पर )
पत्थरों(१) को पूजकर,
पत्थर(२) बरसाते
परस्पर, ये
पत्थर(३),
इन पत्थरों की चोट,
बहुत गहरी होती है,
सदियों तक अमिट रहने वाली,
कलंकित करने वाली...
हाँ, कलंकित कर जाती है ये,
मेरे शहर को, मेरे देश को,
और भ्रम पैदा कर जाती है,
कठोर पत्थर की चोट,
उस मासूम के कोमल मन पर,
जो पढ़ रहा है किताब की वो लकीर,
जहाँ लिखा है,
"आपस में है भाई भाई"
कौन?
कौन है आपस में भाई-भाई?
ये पत्थर जो चोट पहुंचाते हैं एक दूसरे को?
जो बस्तियां जला देते हैं, बात बात पर
जो लूटते हैं घरों को, जात पात पर
जो धर्म की घृणा के नाम पर,करते हैं बलात्कार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार,
और ना जाने क्या क्या अत्याचार....
ये पत्थर पहले इंसान ही बन जाएँ
फिर बने-या-ना-बने भाई-भाई
क्या फर्क पड़ता है, दुश्मन ना बने बस,
हाँ, बस ये दुश्मन ना
बने,फिर शायद, वो पत्थर भी शर्मिंदा ना
होगा,जो शर्मिंदा है..अपने द्वारा किसी के कुचले जाने
से,जो शर्मिंदा है..किसी के मौत का कारण बन जाने
से,जिसे अपने होने पर, पहले से ही पछतावा
था,और अब अपनी दरिंदगी
पर,करना चाहता
है वह आत्महत्या
ये वही पत्थर है.. जिससे कुचलकर की गई थी किसी की हत्या..
और पहले ये हुआ करता
था,उस लिखावट का एक
हिस्सा,जिस पर लिखा था "यहाँ पेशाब करना मना है"