Wednesday, July 30, 2014

बिखरे मोती-१

                      (1)
चाँद को उछाला ही था इस कदर क्यों,
कमबख्त फलक पर दूर जा अटका पड़ा है ,

लोग लड़ते हैं जमीं पर, रौशनी के लिए,


                      (2)
हमारी याद जब आये तो हमको आजमा मिला,
तुम्हारी बेख्याली में ही एक ख्याल होंगे हम

                     (3)
हसरतों का क्या करें, ऐ जिंदगी तू ही बता,
बेटी की मासूम आँखें, नम ना हो कभी, और क्या

Sunday, July 27, 2014

तस्वीर जिंदगी की

कैनवास पर कैसे बनेगी,
तस्वीर जिंदगी की?

शायद..
इस तस्वीर में होगी एक नव-यौवना,
सजी-धजी एक रूपकला,
जैसे दुष्यंत की शकुंतला.
पहनी पुष्पों की मालायें,
और पुष्पों के बाजूबंद,
यौवन की खुशबू महकाती,
किसी कवि की नव-सृजन,

जिसके गेसुओं में, मेघ भरे
आशाओं के गहराए से,
आँखों में जिसके पुलक स्वप्न,
यौवन के संग छाहराये से,
बैठी हो पीत वस्त्रों में,
बस.."पी" की आस लगाये वो,

या शायद, 
इस तस्वीर में होगी एक वृद्धा,
जिसके त्वचा में शल ही शल,
सुस्ताते हों बस थके हुए,
और गाल पोपले धंसे हुए, 
समय की मार से दबे हुए,

जिसके स्तन की धवल सुधा,
बिखर गई बन रेत किधर,
चाँद की खंजर से घायल 
दम तोड़ते आँखों में अरमान,
बैठी हो सूनी राह में चुप,
जिसमे हैं शाम का अँधियारा,

थक हर गया अब सोच सोच,
रंग सूख गए अब सारे हैं,
बस, एक लकीर ही दिया खिंच,
सारे रंगों को संग सींच,
बस यही तस्वीर है जीवन की,
सांसो की एक लम्बी लकीर,
सांसो की एक लम्बी लकीर...

Monday, July 14, 2014

रक्त होता नहीं सिर्फ, धमनियों में बहाने को..

रक्त होता नहीं सिर्फ, धमनियों में बहाने को,
होना चाहिए ये भी, आखों में उतर  आने को,

सरहदों के पार है, चीत्कार एक मासूम की,
इंसानी दिल भी चाहिए, उसे रगों तक पहुँचाने को, 

कई खुदा मिलेंगे, मुकद्दर के बाजार में,
जिद्द जिगर में चाहिए, अपना मुकद्दर बनाने को,

रेत  के समंदर हैं, पीर जो अंदर हैं,
तूफां  का इलम चाहिए, इसे फूंक से उड़ाने को,

लहरों की वफ़ा क्या, कश्ती का भरोसा क्या, 
"रूद्र" तू बन नाखुदा, साहिल पे पहुँच जाने को,