कैनवास पर कैसे बनेगी,
तस्वीर जिंदगी की?
शायद..
इस तस्वीर में होगी एक नव-यौवना,
सजी-धजी एक रूपकला,
जैसे दुष्यंत की शकुंतला.
पहनी पुष्पों की मालायें,
और पुष्पों के बाजूबंद,
यौवन की खुशबू महकाती,
किसी कवि की नव-सृजन,
जिसके गेसुओं में, मेघ भरे
आशाओं के गहराए से,
आँखों में जिसके पुलक स्वप्न,
यौवन के संग छाहराये से,
बैठी हो पीत वस्त्रों में,
बस.."पी" की आस लगाये वो,
या शायद,
इस तस्वीर में होगी एक वृद्धा,
जिसके त्वचा में शल ही शल,
सुस्ताते हों बस थके हुए,
और गाल पोपले धंसे हुए,
समय की मार से दबे हुए,
जिसके स्तन की धवल सुधा,
बिखर गई बन रेत किधर,
चाँद की खंजर से घायल
दम तोड़ते आँखों में अरमान,
बैठी हो सूनी राह में चुप,
जिसमे हैं शाम का अँधियारा,
थक हर गया अब सोच सोच,
रंग सूख गए अब सारे हैं,
बस, एक लकीर ही दिया खिंच,
सारे रंगों को संग सींच,
बस यही तस्वीर है जीवन की,
सांसो की एक लम्बी लकीर,
सांसो की एक लम्बी लकीर...
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