Wednesday, February 25, 2015

मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,

रात्रि का अंतिम पहर है, 
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,

चक्र्व्यूह  दिन रात का है, 
अभिमन्यु सा मैं ठगा हूँ,

समय अकाट्य, और अनश्वर,
कौन करेगा व्यूह भेदन,

कौन काटेगा समय को,
छणिक जीवन, छणिक  स्पंदन,

अंध सिंधु में गोते खाते, 
विरल निर्झर सा प्रकाश,

हार माने सहमे बैठा,
तारों संग विशाल आकाश, 

कौन करता लेखा जोखा,
कौन संगी, कैसा धोखा,

रोज है  एक नया अनुभव,
और  मैं नित ही ठगा हूँ,

रात्रि का अंतिम पहर है, 
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,

मृत्यु वाला मौन नहीं पर,
ख़ामोश हैं बिलकुल अँधेरा,

रोज ही दिन आये है,
पर, होगा कब अगला सबेरा,

नरमुंडों,के झुण्ड संग,
कब मानव धड़कन स्पंदित होंगे,

कब निर्दोष, दोषी ना होंगे,
और कब दोषी दण्डित होंगे,


प्रश्न वही है युगों युगों से, 
प्रश्नो से मैं फिर ठगा हूँ,

रात्रि का अंतिम पहर है, 
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,


Tuesday, February 10, 2015

एक ऐसा आइना हूँ मैं

तू ना देख कर मुझे देख ले,एक ऐसा आइना हूँ मैं,
जहाँ शाम से ना शब् मिले,एक ऐसा सिलसिला हूँ मैं


मुझे इस कदर ना तलाश कर तेरी आरजू में बसा हूँ मैं,
मुझे मत नवाज तू सुकून ए शाम, लम्हों का बस कतरा हूँ मैं,

Friday, February 6, 2015

शुक्रवार की ये शाम आ गई ,

सहमे हुए हों, आचार की बरनी तोड़कर,
और, माँ मुस्कराते हुए गले लगा गई,

बचपन में रूखी-रूठी  सी हो शाम, और,
पापा  संग जैसे,  नई  पेंसिल घर आ गई,

गर्मी की दोपहरी में, बिखरे हों, फर्श पर,
और गुल हुई बिजली, पंखा घुमा गई,

तंग सी गली में  गुजरते,कुछ गुनगुनाते,
पड़ोस की लड़की, नजर आ गई,

कॉलेज का लेक्चर हो कोई, और 
अनजाने उनसे, नजर टकरा गई,

बारिश, में दोस्तों, संग भीगते भागते,, 
टूटी-टपकती  झोपड़ी की चाय भा गई,

तंग आ गए हों, वही-वही कपड़ों से,
और वो फटी, पुरानी जीन्स याद आ गई,

बस ऐसे ही कुछ, कुछ ऐसे ही शायद,
शुक्रवार की ये शाम आ गई ,