रात्रि का अंतिम पहर है,
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,
चक्र्व्यूह दिन रात का है,
अभिमन्यु सा मैं ठगा हूँ,
समय अकाट्य, और अनश्वर,
कौन करेगा व्यूह भेदन,
कौन काटेगा समय को,
छणिक जीवन, छणिक स्पंदन,
अंध सिंधु में गोते खाते,
विरल निर्झर सा प्रकाश,
हार माने सहमे बैठा,
तारों संग विशाल आकाश,
कौन करता लेखा जोखा,
कौन संगी, कैसा धोखा,
रोज है एक नया अनुभव,
और मैं नित ही ठगा हूँ,
रात्रि का अंतिम पहर है,
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,
मृत्यु वाला मौन नहीं पर,
ख़ामोश हैं बिलकुल अँधेरा,
रोज ही दिन आये है,
पर, होगा कब अगला सबेरा,
नरमुंडों,के झुण्ड संग,
कब मानव धड़कन स्पंदित होंगे,
कब निर्दोष, दोषी ना होंगे,
और कब दोषी दण्डित होंगे,
प्रश्न वही है युगों युगों से,
प्रश्नो से मैं फिर ठगा हूँ,
रात्रि का अंतिम पहर है,
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,
चक्र्व्यूह दिन रात का है,
अभिमन्यु सा मैं ठगा हूँ,
समय अकाट्य, और अनश्वर,
कौन करेगा व्यूह भेदन,
कौन काटेगा समय को,
छणिक जीवन, छणिक स्पंदन,
अंध सिंधु में गोते खाते,
विरल निर्झर सा प्रकाश,
हार माने सहमे बैठा,
तारों संग विशाल आकाश,
कौन करता लेखा जोखा,
कौन संगी, कैसा धोखा,
रोज है एक नया अनुभव,
और मैं नित ही ठगा हूँ,
रात्रि का अंतिम पहर है,
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,
मृत्यु वाला मौन नहीं पर,
ख़ामोश हैं बिलकुल अँधेरा,
रोज ही दिन आये है,
पर, होगा कब अगला सबेरा,
नरमुंडों,के झुण्ड संग,
कब मानव धड़कन स्पंदित होंगे,
कब निर्दोष, दोषी ना होंगे,
और कब दोषी दण्डित होंगे,
प्रश्न वही है युगों युगों से,
प्रश्नो से मैं फिर ठगा हूँ,
रात्रि का अंतिम पहर है,
मैं ना प्रहरी पर,जगा हूँ,
Very Nice ....
ReplyDeleteachcha geet hai
ReplyDeleteThanks Kamlesh
DeleteThanks Kamlesh
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