सहमे हुए हों, आचार की बरनी तोड़कर,
और, माँ मुस्कराते हुए गले लगा गई,
बचपन में रूखी-रूठी सी हो शाम, और,
पापा संग जैसे, नई पेंसिल घर आ गई,
गर्मी की दोपहरी में, बिखरे हों, फर्श पर,
और गुल हुई बिजली, पंखा घुमा गई,
तंग सी गली में गुजरते,कुछ गुनगुनाते,
पड़ोस की लड़की, नजर आ गई,
कॉलेज का लेक्चर हो कोई, और
अनजाने उनसे, नजर टकरा गई,
बारिश, में दोस्तों, संग भीगते भागते,,
टूटी-टपकती झोपड़ी की चाय भा गई,
तंग आ गए हों, वही-वही कपड़ों से,
और वो फटी, पुरानी जीन्स याद आ गई,
बस ऐसे ही कुछ, कुछ ऐसे ही शायद,
शुक्रवार की ये शाम आ गई ,
और, माँ मुस्कराते हुए गले लगा गई,
बचपन में रूखी-रूठी सी हो शाम, और,
पापा संग जैसे, नई पेंसिल घर आ गई,
गर्मी की दोपहरी में, बिखरे हों, फर्श पर,
और गुल हुई बिजली, पंखा घुमा गई,
तंग सी गली में गुजरते,कुछ गुनगुनाते,
पड़ोस की लड़की, नजर आ गई,
कॉलेज का लेक्चर हो कोई, और
अनजाने उनसे, नजर टकरा गई,
बारिश, में दोस्तों, संग भीगते भागते,,
टूटी-टपकती झोपड़ी की चाय भा गई,
तंग आ गए हों, वही-वही कपड़ों से,
और वो फटी, पुरानी जीन्स याद आ गई,
बस ऐसे ही कुछ, कुछ ऐसे ही शायद,
शुक्रवार की ये शाम आ गई ,
Very nice man....
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