Friday, February 6, 2015

शुक्रवार की ये शाम आ गई ,

सहमे हुए हों, आचार की बरनी तोड़कर,
और, माँ मुस्कराते हुए गले लगा गई,

बचपन में रूखी-रूठी  सी हो शाम, और,
पापा  संग जैसे,  नई  पेंसिल घर आ गई,

गर्मी की दोपहरी में, बिखरे हों, फर्श पर,
और गुल हुई बिजली, पंखा घुमा गई,

तंग सी गली में  गुजरते,कुछ गुनगुनाते,
पड़ोस की लड़की, नजर आ गई,

कॉलेज का लेक्चर हो कोई, और 
अनजाने उनसे, नजर टकरा गई,

बारिश, में दोस्तों, संग भीगते भागते,, 
टूटी-टपकती  झोपड़ी की चाय भा गई,

तंग आ गए हों, वही-वही कपड़ों से,
और वो फटी, पुरानी जीन्स याद आ गई,

बस ऐसे ही कुछ, कुछ ऐसे ही शायद,
शुक्रवार की ये शाम आ गई ,


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