Friday, May 10, 2013

हासिल


गप्पे बाजी, भागम भाग में रातें यूँ ही कट जाती थी,
वो भी  एक दौर था , रतजगे जब होते थे
पूरी दुनिया सोती थी, हम ख्वाबों में खोते थे,
अपनी दुनिया, जागती आँखे, "कल" की सजावट होती थी,
ये "आज" उस कल का ही दर्पण है,

ऊँचें ख्वाब जो आज बन गए,
गप्पें सारे  वक़्त में सन गए,
कल का प्रश्न ? या आज का प्रहसन ?
अभिनय मेरा, ये ही जीवन,

ये भी एक दौर है, आज बना मौन है,
मौन, गंभीर,स्थिर और अकाट्य,
"आज", कितना खामोश, चुपचाप गुमनाम,

हासिल क्या हुआ मुझे?
एक संवेदनहीन वर्तमान,
एक संवेदनहीन वर्तमान,
          

Sunday, August 14, 2011

लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में


समय झकझोर कर रख दो, पलटकर मोड़ कर रख दो,
बदल लो करवटे अब तुम, ये आलस तोड़ कर रख दो,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में,
बढ़ो अब तोड़ किनारों को, नहीं तो क्या रवानी में,

बहुत है फैला अँधियारा, लगा दो दांव अब सारा,
दिवाकर ना मिले तो क्या, स्वयं तुम हर लो तम सारा,
यही है वक़्त लड़ने का, बदलने का, ना डरने का,
मिला लो स्वर में स्वर मेरे, लगा सिंहनाद सा नारा,
नहीं तो क्या बताओगे, तुम आने वाली पुश्तों को,
कहाँ तुम खुद को पाओगे ,
ना ही हकीकत में, और ना कहानी में,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में,
बढ़ो अब तोड़ किनारों को, नहीं तो क्या रवानी में,

समय है रूद्र बनने का , समय ये तांडव करने का,
समय ये लहू उबलने का, समय ये कुछ तो करने का,
जो खामोश बैठोगे, तो कैसे क्रांति गायन हो ?
रूद्र की संतान बनो, हिंद के जवान बनो,
कहीं ये घडी बीत ना जाये, फिर से नादानी में,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में...

Saturday, February 5, 2011

आशा और निराशा

दूर से दिखना उजाला,

रोशनी का यूँ तो आना,

इससे पहले ना हुआ,

किसने आकर यूँ छुआ,

कि रोम भी कुछ कह उठे,

जल गए सारे दिए जो,

बुझ गए थे युगों तक,

फिर अप्सरा कोई लगी,

एक ख़ुशी कि तार थी जो,

पर अचानक एक दानव,

प्रकट यूँ होने लगा,

जागा शिशु वो अचानक,

चुप था जो , रोने लगा,

वो अप्सरा जाने गई कब?

तार भी टूटा सा था,

बस अंधकार था वहां,

ना रौशनी का नाम था

Sunday, January 16, 2011

मेरे सपने

सूरज की रौशनी में,
मुझे घूरते सफ़ेद बगुले,
छितिज* से आ रहे,
पंख फड-फडाते,
घबरा सा जाता हूँ मैं,
अक्सर ही देखकर,
चेहरे भयानक इनके,
फिर,
सोचता हूँ अचानक,
इनके साये तो रात में भी आये थे,
जीवन के कुछ गीत,
हमने संग संग गाये थे,
फिर रात के ढलने पर,
ये डरावने क्यों हो गये,
मेरे सपने हकीकत में नहीं बदले,
न जाने कहाँ खो गये..
न जाने कहाँ खो गये..
(रचना-२२-०७-१९९९)

Thursday, October 21, 2010

माँ, अब इंतजार मत कर..

माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,
तेरे गोद में वो अब नहीं आएगा,
ना ही तेरे आँचल में वो छुप जायेगा.
ये आँगन तरसता रहेगा..उम्र भर..
मगर उसके आहट को ना पायेगा.
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,

वो अब नहीं बोलेगा,
माँ, आज सर में दर्द है, बालों में ऊँगली फिराना,
आज आलू खाने का मन नहीं कर रहा,
करेले की सब्जी बनाना..
अब तुम उसे डांट नहीं पाओगी,
ज्यादा मिर्च खाने पर..
ना ही दुलार पाओगी..
उसके थककर घर लौट आने पर..
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का, वो बहुत दूर जा चुका,

चल माँ, अब कुछ खा ले,
दिल को बहला ले,
इन पथराई आखों को थोडा आराम दे..

माँ, याद है होली में,,
वो रंगों के बीच कैसे गुम हो जाता था..
और वो रंगों से भीगे, बताशे खाने को फिर निकल आता था..
कहता था..माँ भूख लगी है..
और मुंह में गुझिया दबाये फिर चला जाता था..
माँ अब बताशे कौन खायेगा..
और वो गुझीये खाने थोड़ी ना लौट कर आएगा..

माँ, और वो दिवाली में तुम्हारा रंगोली बनाना,
हम दोनों, अपनी पसंद के रंग खानों में भर देते थे..
उनके बीच दीप रख देते थे..
माँ, हम इस बार दीप नहीं जलाएंगे..
वो ही नहीं है तो रंगोली भी क्यों बनायेंगे..
आँगन को रहने देंगे सूना सूना,
हो सकता है वो आकर पूछे,
कि रंगोली क्यों नहीं बनाई?
दीपों कि माला आँगन में क्यों नहीं सजाई?

माँ, मगर वो परियों के देश से कैसे निकल पायेगा?
सिर्फ तेरी रंगोली देखने..इतनी दूर से वो नहीं आएगा..
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,

Sunday, May 9, 2010

अंधकार

विस्तारित ये काली रात,
शोक संताप का अंधकार,
प्रभात पर लगा प्रश्नचिन्ह,
अनुत्तरित ये सृष्टि सारी,
क्यों सोई है निश्चिन्त,

पदचाप कर्ण पर उभरे हैं,
कुछ आने के, कुछ जाने के,
संशय मन में छिपे हुए हैं,
जीवन को भरमाने के,

चन्द्र किरणे हैं, ओझल क्यों,
पवन चली है, बोझल क्यों,
क्यों नदियाँ सारी है, चुपचाप,
सागर क्यों गंभीर हैं आज,

अंधकार में डटे हुए,
उलूक के फड-फड पाँखो में,
भय व्याप्त सारा है जग में,
और ताने हुए उन साखों में,
कुछ छनों पूर्व ही फैले जो,
आकाश की सुन्दर बांहों में,

मैं भी हूँ अंधकार से व्याकुल,
अधना सा जीव सृष्टि का,
अंध बिंदु कर समा गया,
मुझे अंधकार जो सिन्धु सा...

Monday, May 3, 2010

समय के पंख

समय पंख लगाकर उड़ गया,
मैंने उसके कुछ टूटे पंख,
दबा लिए dairy के पन्नो में,
कुछ दीवारों पर सजा लिए,
और कुछ को तस्वीर बनाकर,
वर्षों संभाले रखा एल्बम में,

अब कभी-कभी फुरसत के छनो में,
उन कोमल पंखो पर हाथ फेरकर,
बीते समय को बुलाता हूँ,
और अपने बेकल मन को,
धीरे से समझाता हूँ,
और एक प्रश्न मन की कंदराओ में,
बहुत भीतर उभर कर आता है,
क्या मेरे बाद की पीढियां भी रखेंगी,
इन पंखों को संभालकर,
जिसके एक टूटे ताग में,
मैं भी रहूँगा शामिल..