Wednesday, June 19, 2013

आज , कल-कब?


समय की कोमल सी रेशें,
बुनती सांसों के चितेरे,
स्वप्न के किरचे बिखेरे,
नींद के उन्मादी फेरे,

मन की अवनि पर लगे हैं,
अभिलाषा के कोपल सुनहरे,
जुगनू से आभास होते,
छोटे छोटे आस सोते ,

आस के विश्वास पर,
और, सखा वृन्द परिहास पर,
जीते चलो , दुःख को दलते ,


ब्यस्त जीवन,खुद का न, मन-तन ,
आप विक्रय कर चले,
स्वयं पर अभिसार को,

बूंद बारिश, हवा शीतल,
देख तरसे, मन ना बरसे,
जीत कहते, स्वयं हार को?

रुक ठहर जा, अब सुधर जा,
परिवर्तित हो, कुछ बदल जा,
करो हिम्मत , थोडा जी लो,
फेंको, छतरी, गीले हो, लो,

माप दंड, ब्यापार में होते,
जीवन तो उद्दंड है होता,
समय में मत बांधो दिन को,
दिनकर के क्या दास तुम हो,
कोई हँसता नेपथ्य में,अरे,
नाट्य का परिहास तुम हो?

स्वयं ही फेंको लकीरे,
मस्त होकर ब्योम में,
इन्द्रधनुषी देखो सपने,
कर, कहे जो मन ये तेरा,
जी ले अब कुछ,
दिन रात के छोड़ फेरे,
ये नहीं हैं तेरे मेरे,

बहुत कुछ है, परे इनके,
ख़ुशी छोटी, बड़ी यादें,
बातों से जो बनती बातें,
हैं छणिक सब, आज , कल-कब?
बस यही है, कणी सी है,
मोल इसका?, मणि सी है,
जी ले इसको, बीती जाती
कल नहीं कुछ, बस यही हैं,
कल नहीं कुछ, बस यही हैं,

Thursday, May 23, 2013

ना जाने क्यों?

तांक कर धागा हमारी यादों का तुमने,
जो एक सुई अपनी ऊँगली में चुभा ली, गलती से फिर भी,
की वो सुई अब तलक तो ना सम्हाले रखा होगा पर,
नजर तो जख्म पर जाती ही होगी, झूठ ना कहना,

ना कहना झूठ कि चुपचाप जब भी तुम संवरती थी,
तो फिर जुल्फों की आवारगी, खुद कैसे बिखरती थी,
और वो, आइना जिसे कहती है दुनिया यूँ ही अनजाने,
होती सामने तू, अक्स पर मेरा दिखाता था,

कहें क्या अक्स को लेकर, धुप के टुकड़े से पूछो तुम,
की जब देखता है वो मुझको तुम हमेशा पास होती हो,
कभी बारिश कभी बंजर, ये छुट-ते मंजर,
मगर अब भी कहानी है, जाने किसकी जुबानी है,

जुबानी मेरी या तेरी, कहो क्या फर्क पड़ता है,
उस रोज पुराने चौखट के इस पार आकर,
कहा था मैंने - ध्यान रख अपना,
मगर तू छोड़ने आई थी मुझको, मेरे बिन छूटे,
तभी बस चुभ गई थी सुई, अटकी धागे में कोई,

पता नहीं मुझको अब तक,
तुझे क्या है पता ये?
ना भी हो शायद,
की मोड़ के उस पार आकर,
दूर बहुत दूर जाकर,
गुम हो कर, तलाशो में ही अपनी मैं,
आज भी अटका हूँ , उसी धागे में,
उसी चौखट पर, उसी अक्स में,
उसी आईने में, उसी दुनिया में,
ना जाने क्यों?

Friday, May 10, 2013

हासिल


गप्पे बाजी, भागम भाग में रातें यूँ ही कट जाती थी,
वो भी  एक दौर था , रतजगे जब होते थे
पूरी दुनिया सोती थी, हम ख्वाबों में खोते थे,
अपनी दुनिया, जागती आँखे, "कल" की सजावट होती थी,
ये "आज" उस कल का ही दर्पण है,

ऊँचें ख्वाब जो आज बन गए,
गप्पें सारे  वक़्त में सन गए,
कल का प्रश्न ? या आज का प्रहसन ?
अभिनय मेरा, ये ही जीवन,

ये भी एक दौर है, आज बना मौन है,
मौन, गंभीर,स्थिर और अकाट्य,
"आज", कितना खामोश, चुपचाप गुमनाम,

हासिल क्या हुआ मुझे?
एक संवेदनहीन वर्तमान,
एक संवेदनहीन वर्तमान,
          

Sunday, August 14, 2011

लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में


समय झकझोर कर रख दो, पलटकर मोड़ कर रख दो,
बदल लो करवटे अब तुम, ये आलस तोड़ कर रख दो,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में,
बढ़ो अब तोड़ किनारों को, नहीं तो क्या रवानी में,

बहुत है फैला अँधियारा, लगा दो दांव अब सारा,
दिवाकर ना मिले तो क्या, स्वयं तुम हर लो तम सारा,
यही है वक़्त लड़ने का, बदलने का, ना डरने का,
मिला लो स्वर में स्वर मेरे, लगा सिंहनाद सा नारा,
नहीं तो क्या बताओगे, तुम आने वाली पुश्तों को,
कहाँ तुम खुद को पाओगे ,
ना ही हकीकत में, और ना कहानी में,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में,
बढ़ो अब तोड़ किनारों को, नहीं तो क्या रवानी में,

समय है रूद्र बनने का , समय ये तांडव करने का,
समय ये लहू उबलने का, समय ये कुछ तो करने का,
जो खामोश बैठोगे, तो कैसे क्रांति गायन हो ?
रूद्र की संतान बनो, हिंद के जवान बनो,
कहीं ये घडी बीत ना जाये, फिर से नादानी में,
लगा दो आग पानी में, नहीं तो क्या जवानी में...

Saturday, February 5, 2011

आशा और निराशा

दूर से दिखना उजाला,

रोशनी का यूँ तो आना,

इससे पहले ना हुआ,

किसने आकर यूँ छुआ,

कि रोम भी कुछ कह उठे,

जल गए सारे दिए जो,

बुझ गए थे युगों तक,

फिर अप्सरा कोई लगी,

एक ख़ुशी कि तार थी जो,

पर अचानक एक दानव,

प्रकट यूँ होने लगा,

जागा शिशु वो अचानक,

चुप था जो , रोने लगा,

वो अप्सरा जाने गई कब?

तार भी टूटा सा था,

बस अंधकार था वहां,

ना रौशनी का नाम था

Sunday, January 16, 2011

मेरे सपने

सूरज की रौशनी में,
मुझे घूरते सफ़ेद बगुले,
छितिज* से आ रहे,
पंख फड-फडाते,
घबरा सा जाता हूँ मैं,
अक्सर ही देखकर,
चेहरे भयानक इनके,
फिर,
सोचता हूँ अचानक,
इनके साये तो रात में भी आये थे,
जीवन के कुछ गीत,
हमने संग संग गाये थे,
फिर रात के ढलने पर,
ये डरावने क्यों हो गये,
मेरे सपने हकीकत में नहीं बदले,
न जाने कहाँ खो गये..
न जाने कहाँ खो गये..
(रचना-२२-०७-१९९९)

Thursday, October 21, 2010

माँ, अब इंतजार मत कर..

माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,
तेरे गोद में वो अब नहीं आएगा,
ना ही तेरे आँचल में वो छुप जायेगा.
ये आँगन तरसता रहेगा..उम्र भर..
मगर उसके आहट को ना पायेगा.
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,

वो अब नहीं बोलेगा,
माँ, आज सर में दर्द है, बालों में ऊँगली फिराना,
आज आलू खाने का मन नहीं कर रहा,
करेले की सब्जी बनाना..
अब तुम उसे डांट नहीं पाओगी,
ज्यादा मिर्च खाने पर..
ना ही दुलार पाओगी..
उसके थककर घर लौट आने पर..
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का, वो बहुत दूर जा चुका,

चल माँ, अब कुछ खा ले,
दिल को बहला ले,
इन पथराई आखों को थोडा आराम दे..

माँ, याद है होली में,,
वो रंगों के बीच कैसे गुम हो जाता था..
और वो रंगों से भीगे, बताशे खाने को फिर निकल आता था..
कहता था..माँ भूख लगी है..
और मुंह में गुझिया दबाये फिर चला जाता था..
माँ अब बताशे कौन खायेगा..
और वो गुझीये खाने थोड़ी ना लौट कर आएगा..

माँ, और वो दिवाली में तुम्हारा रंगोली बनाना,
हम दोनों, अपनी पसंद के रंग खानों में भर देते थे..
उनके बीच दीप रख देते थे..
माँ, हम इस बार दीप नहीं जलाएंगे..
वो ही नहीं है तो रंगोली भी क्यों बनायेंगे..
आँगन को रहने देंगे सूना सूना,
हो सकता है वो आकर पूछे,
कि रंगोली क्यों नहीं बनाई?
दीपों कि माला आँगन में क्यों नहीं सजाई?

माँ, मगर वो परियों के देश से कैसे निकल पायेगा?
सिर्फ तेरी रंगोली देखने..इतनी दूर से वो नहीं आएगा..
माँ, अब इंतजार मत कर उसके लौट आने का,
वो बहुत दूर जा चुका,