Sunday, November 2, 2014

मौन

आज बस मौन हूँ मैं,
वाचाल होकर ना जाना कभी,
प्रमुख हूँ या, गौण हूँ मैं,

कई बार, सीखा जीवन से,
औरोँ  को कई सीख दिया,
समझ नहीं आता मगर,
एकलव्य हूँ या  द्रोण  हूँ मैं,

Thursday, September 11, 2014

जो मिल गया उसी की तलाश थी,

मिलना होता मिल ही जाते, 
समय की नदी में गोते खाते 
पर हम तुम कभी मिल ना पाये,
बस "दूरी " ही पास थी,

मिटटी सोना, सोना मिटटी,
खोना पाना, पाकर खोना,
खो गए, पाते पाते हम तो,
जाने कैसी आस थी,


जिसे चाहा था, वो मिला नहीं,
जो मिल गया उसी की तलाश थी,
काश काश में कटी जिंदगी,
कैसी गजब की प्यास थी,

Saturday, August 23, 2014

मैं भी कुछ अलग नहीं

सुबह का अख़बार,
चाय का कप
नाश्ते की प्लेट,
सामूहिक बलात्कार,
फिर नृशंस हत्या की खबर,

रोज वाली बस,
फिर वही काम काज,
ब्यस्त सा दिन,
ख़त्म फिर दिन,
ख़त्म फिर रात,

दूसरा दिन,
नया अख़बार,
नई ख़बरें,
मृत ह्रदय,

रोज वाली बस,,
और बस में  सफर करते, 
कई नर मुंड,
एक जोड़ी हाथ-पैरो के साथ,
अंधी आँखों के साथ,
गूंगे, जुबान के साथ,
मांस के  टुकड़ों, से जुड़े,

चले जा रहे हैं,
मृत ह्रदय लेकर,
दिन शुरू करके, 
फिर  ख़त्म करने,
मैं भी कुछ अलग नहीं। … 












Sunday, August 10, 2014

अबला


विषदंत अगर मैं होता तो ,
ना नैन तेरे कातर  होते,
अस्मत के लूटे जाने पर,
ना हाथ बांध ये नर सोते,

ना, कोई तुझे अबला कहता,
ना कहता कोई बेचारी,
मैं नीलकंठ सा बन जाता,
पी लेता, जो विष प्याले होते,

पुरुष की काली सत्ता पर,
अब तक चुप रहता युग क्यों है,
क्यों, नारी की पूजा करता -छलता
ये छद्म सा  कलयुग है,

ये समाज है,
बस, नर मुंडो का,
पीड़ित, छलित,
लाशो की सड़ती झुंडों  का,
..................................

Wednesday, July 30, 2014

बिखरे मोती-१

                      (1)
चाँद को उछाला ही था इस कदर क्यों,
कमबख्त फलक पर दूर जा अटका पड़ा है ,

लोग लड़ते हैं जमीं पर, रौशनी के लिए,


                      (2)
हमारी याद जब आये तो हमको आजमा मिला,
तुम्हारी बेख्याली में ही एक ख्याल होंगे हम

                     (3)
हसरतों का क्या करें, ऐ जिंदगी तू ही बता,
बेटी की मासूम आँखें, नम ना हो कभी, और क्या

Sunday, July 27, 2014

तस्वीर जिंदगी की

कैनवास पर कैसे बनेगी,
तस्वीर जिंदगी की?

शायद..
इस तस्वीर में होगी एक नव-यौवना,
सजी-धजी एक रूपकला,
जैसे दुष्यंत की शकुंतला.
पहनी पुष्पों की मालायें,
और पुष्पों के बाजूबंद,
यौवन की खुशबू महकाती,
किसी कवि की नव-सृजन,

जिसके गेसुओं में, मेघ भरे
आशाओं के गहराए से,
आँखों में जिसके पुलक स्वप्न,
यौवन के संग छाहराये से,
बैठी हो पीत वस्त्रों में,
बस.."पी" की आस लगाये वो,

या शायद, 
इस तस्वीर में होगी एक वृद्धा,
जिसके त्वचा में शल ही शल,
सुस्ताते हों बस थके हुए,
और गाल पोपले धंसे हुए, 
समय की मार से दबे हुए,

जिसके स्तन की धवल सुधा,
बिखर गई बन रेत किधर,
चाँद की खंजर से घायल 
दम तोड़ते आँखों में अरमान,
बैठी हो सूनी राह में चुप,
जिसमे हैं शाम का अँधियारा,

थक हर गया अब सोच सोच,
रंग सूख गए अब सारे हैं,
बस, एक लकीर ही दिया खिंच,
सारे रंगों को संग सींच,
बस यही तस्वीर है जीवन की,
सांसो की एक लम्बी लकीर,
सांसो की एक लम्बी लकीर...

Monday, July 14, 2014

रक्त होता नहीं सिर्फ, धमनियों में बहाने को..

रक्त होता नहीं सिर्फ, धमनियों में बहाने को,
होना चाहिए ये भी, आखों में उतर  आने को,

सरहदों के पार है, चीत्कार एक मासूम की,
इंसानी दिल भी चाहिए, उसे रगों तक पहुँचाने को, 

कई खुदा मिलेंगे, मुकद्दर के बाजार में,
जिद्द जिगर में चाहिए, अपना मुकद्दर बनाने को,

रेत  के समंदर हैं, पीर जो अंदर हैं,
तूफां  का इलम चाहिए, इसे फूंक से उड़ाने को,

लहरों की वफ़ा क्या, कश्ती का भरोसा क्या, 
"रूद्र" तू बन नाखुदा, साहिल पे पहुँच जाने को,

Monday, June 2, 2014

रूद्र है, कहीं छुपा..

                
रूद्र है, कहीं छुपा, की आसमा भी श्याम है,
समय की परिधि पर लग गया लगाम है,

ढूंढकर, सारी दिशाए,हम कहीं गुमनाम हैं,
कोई अनकही कहानी, कह रहे तमाम हैं,

कोई करवट, कोई आहट, का है इंतजार अब तो,
क्या करें पर, पथ ही सारे, कर रहें विश्राम हैं, 

भोर की कोई कहानी, कोई आकर के सुनाएँ,
अपहरण सूरज का कर के, बन रहे अनजान हैं,

भ्रम प्रचारक, भ्रमर कोई, कैसे कैसे स्वांग करता,
लोग भी पर हैं अबोले, जैसे वो निष्प्राण हैं,

 

Thursday, April 17, 2014

ये कैसा जीवन

ये कैसा जीवन? छोभ नया, कभी शोक नया कभी रोग नया,
नित जीने के आयाम बढे, कभी लाभ नया कभी  लोभ नया,

हृदय के हर स्पंदन में, बदली है मेरी परिभाषा  
कभी खुद ही मैं गुमनाम हुआ, कही पाप नया कहीं दोष नया, 

कभी मर्यादा, कभी लोक लाज, कभी ग्रंथो के निर्देश-जाल, 
मैं निर्णायक  कभी हुआ  नहीं, कभी  दिशा नई , कभी  दशा नया,

कभी ये समाज , कभी जड़  रिवाज , कभी अपनों  की है मजबूरी,
ये जीवन क्या  खुद मैं  जीता? कभी स्वामी  नया, कभी  नाट्य नया,